Tuesday, December 17, 2013

Introductory note

आधुनिक भारत की संस्कृति एक विकसित शतदल कमल के समान है जिसका एक -एक दल एक -एक प्रांतीय भाषा और  उसकी  साहित्य  संस्कृति  है . किसी एक को मिटा देने से उस कमल की शोभा ही नष्ट हो जाएगी . हम चाहते है कि भारत की सब प्रांतीय बोलिया  जिनमे सुंदर साहित्य सृष्टी हुई है ,अपने - अपने घर मे ( प्रांत मे ) रानी बनकर रहे , और आधुनिक भाषाओ  के हार की मध्य मणि हिंदी भारत भारती  होकर विराजती रहे .
                           - रबिन्द्रनाथ ठागुर


नोबुल  पुरस्कार   प्राप्त  ठगुर जी  का  यह  सुंदर  विचार  प्रत्येक  भारतीय  के मन को भाता  है . समन्वयता  की  बात  पर आते  हैं  तो  यह  कमाल सिर्फ  भारतीय  संस्कृति  में  ही  है . गुरूदेव जी  के  इस विचार को मै अंतर्मन  से चाहती  हू  और  मै अपने अध्ययन - अध्यापन  के अनुभावो  को इसके साथ जोडना  चाहती हुं. मेरे  विचरो में  विद्यालय भी शतदल कमल के समान है  जिसका एक -एक दल एक - एक  छात्र -छात्रा  के समान है  जिनकी  सामाजिक , आर्थिक , सांस्कृतिक पृष्ठभूमि  एक दूसरे से अलग होते हुये भी विद्यालय से रचित  सर्वजनीन  संस्कृति ( Speak Softly and Pleasantly...... Smile always.... Be Positive and Progressive.... Feel good Look good and Do good....... Have and show Confidence ) को अपना कर अपनी और विद्यालय की  , समाज की  और देश की  शोभा  बढाने में  अपना योगदान दे रहे  हैं और अपनी एक नयी छवि  समाज में  दे रहे हैं .
lots of love to my Mentors and all my Students